सरोगेट ऐडवरटाइजिंग (Surrogate Advertising)
सरोगेट ऐडवरटाइजिंग
(Surrogate Advertising)
प्यारे साथियो
नमस्कार,
आप सभी रोज
ही टीवी,रेडियो इत्यादि के माध्यम से सुनते आ रहे होंगे बोलो ज़ुबाँ केसरी …. दो उंगली
उठाकर पान मसाले का प्रचार। बात यू तो अजय देवगन से शुरू हुई थी। शाहरुख खान तक पहुंची
और फिर रणवीर सिंह और उसके बाद सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार तक। बाकी
सब तो ठीक है लेकिन जब बच्चन साहब और अक्षय कुमार ने इस पान मसाले का प्रचार किया तो
लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से काफ़ी आपत्ति जताई। बाद में, बच्चन साहब ने सरोगेट
ऐडवरटाइजिंग का हवाला देते हुए पान मसाला ब्रांड से कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया। अक्षय
कुमार ने भी सोशल मीडिया पर माफ़ी मांगते हुए आगे से ऐसे प्रचार न करने का बात रखी
आप को बताते
चले की सरोगेट ऐडवरटाइजिंग के ऐसे ही मामलों को देखते हुए अभी हाल ही में सरकार ने
इस बारे में एक दिशा-निर्देश जारी किया है।
कुछ सवालों
के साथ सरोगेट ऐडवर्टाइजमेंट को जानने का प्रयास करते है
सबसे पहला सवाल
यह कि सरोगेट ऐडवर्टाइजमेंट होता क्या है? आपने अक्सर टीवी पर किसी शराब, तंबाकू या
ऐसे ही किसी ऐसे उत्पाद का प्रचार देखा होगा जिसमें उस उत्पाद के बारे में सीधे तौर
पर बात ना करके उसे कोई और नाम देकर प्रचारित किया जाता है। उदाहरण के तौर पर मादक
पदार्थों को एनर्जी ड्रिंक बताकर या फिर पान मसाला आदि को माउथ फ्रेशनर बताकर। यानी
एक ऐसा प्रचार जिसमे उत्पाद तो कोई और दिखाया जाता है, जबकि वास्तविक उत्पाद कुछ और
होता है और यह सीधा-सीधा ब्रांड से जुड़ा होता है। जिसे सेरोगेट एडवरटाइजिंग के नाम
से जाना जाता है
दूसरा सवाल
है कि आखिर इसकी जरूरत ही क्यों पड़ती है? जो उत्पाद है उसे सीधे-सीधे उसी के नाम पर
क्यों नहीं प्रचारित किया जाता है? दरअसल, बाजार में कई ऐसे उत्पाद होते हैं, जिनके
सीधे प्रचार पर कानूनी प्रतिबंध है। आमतौर पर इनमें शराब, सिगरेट और पान मसाला जैसे
उत्पाद शामिल होते हैं। ऐसे में, इन उत्पादों के प्रचार के लिए सरोगेट एडवर्टाइजमेंट
का रास्ता अपनाया जाता है।
तीसरा सवाल
यह कि भारत में इस तरह के कौन-कौन से कानून मौजूद हैं? भारत ने भी इस तरह के कई कानून
पारित किये हुए है । उदाहरण के तौर पर सिगरेट और तंबाकू से जुड़े उत्पादों के सीधे
प्रचार को रोकने के लिए साल 2003 में सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम लाया गया
था। इसका पूरा नाम सिगरेट और अन्य तम्बाकू उत्पाद (विज्ञापन का प्रतिषेध और व्यापार
तथा वाणिज्य, उत्पादन, प्रदाय और वितरण का विनियमन) अधिनियम, 2003 है। इसे संक्षेप
में COTPA भी कहते हैं। तंबाकू और सिगरेट से जुड़े उत्पादों का सीधे तौर पर प्रचार
करने पर 2-5 साल तक की सजा और 1- 5 हजार तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा,
केबल टेलीविजन नेटवर्क एक्ट 1994 के माध्यम से भी सिगरेट, तंबाकू, शराब या अन्य किसी
मादक पदार्थ के सीधे प्रचार पर प्रतिबंध लगाया गया है।
आपको याद होगा
कि साल 2016 में भी एक पान मसाला ब्रांड के एक प्रचार को लेकर काफी विवाद हुआ था। इसमें
जेम्स बॉन्ड का किरदार निभा चुके मशहूर अभिनेता पियर्स ब्रोसनन पान मसाला का प्रचार
करते हुए नजर आए थे। जब मामले में ज्यादा तूल पकड़ा तो एक्टर ने कहा था कि कंपनी ने
उन्हें धोखे में रखा था। उन्हें बताया गया कि ये एक माउथ फ्रेशनर है और इसके हानिकारक
पहलू को उन्हें नहीं बताया गया
कंपनियां और सेलिब्रिटीज लोगों को और गुमराह ना कर पाए इसी के मद्देनजर हाल ही में उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने 'भ्रामक विज्ञापनों की रोकथाम व विज्ञापनों के संबंध में आवश्यक सावधानी दिशा निर्देश-2022' जारी किया है। इसमें बच्चों को निशाना बनाने वाले विज्ञापनों के बारे में भी 19 प्रावधान किए गए हैं। नए दिशा-निर्देशो को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है। उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत की जाएगी। इन नए दिशा-निर्देशों के तहत अब चर्चित सितारों को भी विज्ञापन के प्रति जवाबदेही तय करनी होगी। यदि कंपनी में उनकी हिस्सेदारी है या फिर वह उस कंपनी का मालिक है, तो उन्हें इसके बारे में भी उपभोक्ता को जानकारी देनी होगी। सरोगेट विज्ञापनों पर भी पाबंदी लगा दी गई है। बिना सत्यता साबित किए विज्ञापन अब नहीं चलेंगे। इसका मकसद भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाना है। इसके साथ ही विज्ञापन को उपभोक्ताओं के प्रति जवाबदेह बनाना और विज्ञापन निर्माण से प्रदर्शन तक पारदर्शी व्यवस्था बनाने पर भी फोकस किया गया है।
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